album cover
Fikar
75
Indian Pop
Fikar wurde am 15. Dezember 2024 von Saregama India Ltd als Teil des Albums MTV Hustle 4, Episode. 18 - EP veröffentlicht
album cover
Veröffentlichungsdatum15. Dezember 2024
LabelSaregama India Ltd
LanguageHindi
Melodizität
Akustizität
Valence
Tanzbarkeit
Energie
BPM103

Musikvideo

Musikvideo

Credits

PERFORMING ARTISTS
Dharmik
Dharmik
Lead Vocals
Aditya Pushkarna
Aditya Pushkarna
Performer
COMPOSITION & LYRICS
Dharmik
Dharmik
Songwriter
PRODUCTION & ENGINEERING
Aditya Pushkarna
Aditya Pushkarna
Producer

Songtexte

धार्मिक, सच्चाई की आवाज़ को लेके
मेको अपनो की फ़िकर है
तू किधर भटक गया? घर तेरा किधर है?
मेको अपनो की फ़िकर है
तू किधर भटक गया? घर तेरा किधर है?
ज़िकर ये अधिकतर है
जो ढूंढते बाहर अक्सर मिलता वो भीतर है
मेको अपनो की फ़िकर है
तू किधर भटक गया? घर तेरा किधर है?
ज़िकर ये अधिकतर है
जो ढूंढते बाहर अक्सर मिलता वो भीतर है
कोई मियां-बीवी नशे में, मज़े में
शादी-शुदा रहके दूसरों के कब्ज़े में
शर्म से देख, मर जा रहे घरवाले
बच्चे भुगत रहे, सो ज़िंदगी साज़े में
कॉमन करदे रे बाबू और शोना का
रोना बंद होना तोह बिस्तर पे सोना, हाँ
जो सगे नहीं ख़ुद के मां-बाप के
वह तेरे क्या होंगे? तू इतना तोह सोचना था
आज जनरेशन यूथ आइकन्स के चक्कर में
ख़ुद के घर के संस्कार भूली
शराब जुआ धुआँ साइकेडेलिक चमड़ी
क्या मालूम कौन-कौन से नशों में डूब
कब तक सोते? और क्या-क्या खोते?
गलती नहीं रोकें तोह धोखे पे धोखे
दोस्त समझ के मैं समझा रहा हूं
दोस्तों के माँ-बाप देखा, बेबस घुट-घुट के रोते
तेरे माँ-बाप की फिकर है
तू किधर भटक गया? घर तेरा किधर है?
ये धूल तेरी ग्लिटर है
वो माँ-बाप के चेहरे पे लांछन है, कीचड़ है
तेरे मां-बाप कु फ़िकर है
तू किधर भटक गया? घर तेरा किधर है?
ज़िकर ये अधिकतर है
बस पलट के आजा, घर अब भी वहीं पर है
भाई, बाप, बेटे हैवाना
दूसरों के छोड़, ख़ुद के घर में है शैताना
अकेली नारी पे जैसी नज़र जिसकी
खुदा-ना-खस्ता कोई आपके साथ दोहराना
शिक्षित ज़माना, भगवान को नहीं माना
वेद-पुराण प्राचीन भारत की पहचाना
लाशान खाना पेटों में शमशाना
एक-एक और भुगतेंगे पाप ऐसा पछताना
ज़िद्दी औरत है, दोज़ख की सौबत
जहाँ इज़्ज़त बस कचरा, धन दौलत ही दौलत
घर की मंथरा चुप है जब तक मोहल्लत
आज सीता को वनवास बोल, पूछेंगी सहूलत
औरत-बच्चों पे नामर्द हाथ उठाते
माँ-बाप को मारते रुलाते नवाबज़ादे
किश्ती कर्मों की चुकाते-चुकाते
मौत की भीख मांगना जीते-जी चिता पे
मेको दुनिया की फिकर है
लेकिन दुनिया में पैसा, बस पैसों का ज़िकर है
हवा-पानी लीथल है
करके क़ुदरत दफन इंसान क़बर खड़ी करे
गरीबी ज़मीन पर है
क्यों कि निखरती बेईमानी शिखर पे निडर है
भविष्य पे ट्रिगर है
जहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी निशाचर ही ईश्वर है
मेको अपनो की फ़िकर है
तू किधर भटक गया? घर तेरा किधर है?
ज़िकर ये अधिकतर है
जो ढूंढते बाहर अक्सर मिलता वो भीतर है
मेको अपनो की फ़िकर है
तू किधर भटक गया? घर तेरा किधर है?
ज़िकर ये अधिकतर है
बस पलट के आजा, घर अब भी वहीं पर है
Written by: Dharmik
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