album cover
Apradhi
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Apradhi was released on July 13, 2020 by White Gold as a part of the album Apradhi - Single
July 13, 2020
LabelWhite Gold
LanguageHindi
BPM137
Melodicness
Acousticness
Valence
Danceability
Energy

Lyrics

[Verse 1]
समाज है तभी हूं
आवाज़ एक दबी हूं
आज़ाद एक कवि हूं
ये याद है तभी हूं
अभी हूं मैं सच या फिर झूठ का चेहरा
अभी हूं मैं छाया या धूप दोपहरा
या राज़ एक गहरा आँखें करती प्रतीत
इन्हीं में छिपा हम सभी का अतीत
कि हम कितने भले हैं और कितने बुरे हैं
कितने सच छिपे हमारे झूठ के थले है
जिस रस्ते चले है, क्यों हमने चुना है
किसी का इंक़लाब किसी का गुनाह है
जो भी कहा सुना है समय का वो दर्पण
जो ख्वाब बुना दे उसी को समर्पण
और इस शान में रहता उस ख्वाबका होकर
वो देते सलाए तू ये कर तू वो कर
सलाहें उनकी ना मानी बनाली अपनी आज़ादी
और उनकी निगाहों में बन गया अपराधी
[Chorus]
तो हाँ मैं एक अपराधी हूं
हाँ मैं एक अपराधी हूं
हाँ मैं एक अपराधी हूं
हाँ मैं एक अपराधी हूं
दूध से धुले सीधे साधो की दुनिया में
सही गलत सिखाते शहज़ादो की दुनिया में
इंसाफ करते गुनाह के प्यादो की दुनिया में
हाँ मैं एक अपराधी हूं
दूध से धुले सीधे साधो की दुनिया में
सही गलत सिखाते शहज़ादो की दुनिया में
इंसाफ करते गुनाह के प्यादो की दुनिया में
हाँ मैं एक अपराधी हूं
[Verse 2]
जरा सोचो तो ख़ुद अपनी सोच हो तो
या फिर कोई करता है काबू तुम्हारी सोचो को
कहता वो करता हिफ़ाजत वो आफ़त से
मिलावट हर दावत में करता वो आदत से
वो कसमे दे फिर कसम से वो बसमे ले
फिर कसम से देके तू उसके ही चश्मे से
और जिसने भी दिया चश्मे उतार
उसे डराओ इत्ता दबाओ कि वो बदले स्वभाव
और उसके प्रभाव से
सवाल ही करना वो छोड़ दे चाहे वो अपने हक़ खो दे
ना खरे विरोध ये टीवी की खबरो पे झोर दे
कुछ भले वो जो दे एक ही दिशा में वो धोरे
जैसे ब्लिंकर पहने घोरे हाँ घोरे
अंधो के कहने राजा ने बहरलिया अपने कहाजने
जो छोड़े चश्मे लगाने कड़ी वो उन्हें सजा दे
मेरी खुदा है मुझी में इल्जाम लगा मैं नास्तिक
कहा ये है बीमारी मानसिक ये सोच ना हमारे साथ ठीक
बेधिया बंद रिवाज की ये सोच पेश की अदालत में
क्योंकि बदलाव से डरना तो है हमारी आदत में
खड़े रहो नजरें झुका कर, सहन हर गुनाह कर
कायदे कमीज में तहजीब और तमीज से
तुझे मिला इंसाफ़ क्या तो इनसे क्या माँगना
ना बन सहने के आदी तू भले कहला अपराधी तू
[Chorus]
हाँ मैं एक अपराधी हूं
हाँ मैं एक अपराधी हूं
हाँ मैं एक अपराधी हूं
हाँ मैं एक अपराधी हूं
दूध से धुले सीधे साधो की दुनिया में
सही गलत सिखाते शहज़ादो की दुनिया में
इंसाफ करते गुनाह के प्यादो की दुनिया में
हाँ मैं एक अपराधी हूं
दूध से धुले सीधे साधो की दुनिया में
सही गलत सिखाते शहज़ादो की दुनिया में
इंसाफ करते गुनाह के प्यादो की दुनिया में
हाँ मैं एक अपराधी हूं
[Verse 3]
खड़ा रह नज़रें झुका कर
सहन तू तेरा हर गुनाह कर
कायदे कमीज में आह
तहज़ीब और तमीज़ में आह
तुझे मिला इंसाफ़ क्या
तो इनसे क्या मांगना हाँ
ना बन सहने के अधि तु
भले कहला अपराधी तू
Written by: Rajat Singh, pankaj sharma
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